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Friday, December 11, 2009

फरमान-ए-नौशाद

दुनिया कहीं जो बनती मिटती ज़रूर है |
परदे के पीछे कोई न कोई ज़रूर है ||

जाते हैं लोग जा के फिर आते नहीं कभी|
दीवार के उधर कोई बस्ती ज़रूर है||

मुमकिन नहीं कि दर ए मोहब्बत अयाँ न हो|
खिलती है जब कली तो महकती ज़रूर है||

ये जानते हुए कि पिघलना है रातभर |
ये शम्मा का जिगर है कि जलती ज़रूर है ||

नागिन ही जानिये इसे दुनिया है इसका नाम |
लाख आस्तीं में पालिए डसती ज़रूर है ||

जां देके भी खरीदो तो दुनिया ना आये हाथ|
ये मुश्क-ए-ख़ाक कहने को सस्ती ज़रूर है||

नौशाद झुक के मिल कि बड़ाई इसी में है |
जो शाख हरी हो लचकती ज़रूर है ||